हज़रत थानवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

हज़रत थानवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

मुदर्रिसीन (शिक्षकों) को चाहिए कि हर तालिब-ए-इल्म (छात्र) को पूरा अरबी पढ़ाना ज़रूरी न समझें, जिसके अंदर मुनासबत (योग्यता) देखें, और फ़हम-ए-सलीम (सही समझ) पाएँ, उसको सब किताबें पढ़ा दें, और जिसको मुनासबत न हो, या फ़हम-ए-सलीम न हो, उसको बक़द्रे-ज़रूरत (ज़रूरत के मुताबिक़) मसाइल पढ़ा कर कह दें कि जाओ दुनिया के धंधे में लगो, तिमाही व हिर्फ़त (व्यापार और शिल्प) करो, क्योंकि हर शख़्स मुक़्तदा (नेता/मार्गदर्शक) बनने के लायक़ नहीं होता, बाज़े नालायक़ भी होते हैं, ऐसों को फ़ारिग़-उत-तहसील (स्नातक) बना कर मुक़्तदा बना देना ख़यानत (विश्वासघात) है। ऐसे लोगों के लिए एक मिक़दार मोअय्यन (मात्रा/सीमा निश्चित) कर लेनी चाहिए कि उससे आगे उनको न पढ़ाया जाए, और वह मिक़दार ऐसी हो जो दीन के ज़रूरी मसाइल जानने के लिए काफ़ी हो। (तामीम अत-तालीम, अत-तब्लीग़ - सफ़ा: 212 - सफ़ा: 161 - जिल्द: 21)

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