New Motivational Kalam 2026 | Inna Kaidi Mateen | Hafiz Amanullah Qazi

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इल्म का मंशूर: शरियत के विद्यार्थियों (तलबा) के लिए महत्वपूर्ण और इब्रतनाक नसीहतें (भाग दो)

इल्म का मंशूर: शरियत के विद्यार्थियों (तलबा) के लिए महत्वपूर्ण और इब्रतनाक नसीहतें (भाग दो)

बिस्मिल्लाह; रब्बी यस्सिर व अ'इन! (अल्लाह के नाम से; ऐ मेरे रब, आसानी फ़रमा और मदद कर!) नोट: इस मंशूर (घोषणापत्र) के मुखातिब (संबोधित लोग) सिर्फ उलूमे शरीयत (इस्लामी शास्त्र के ज्ञान) के तलबा (विद्यार्थी) हैं। इल्मे शरई (धार्मिक ज्ञान) को अल्लाह तआला ने 'कौले थक़ील' (एक भारी बात) क़रार दिया है। यह बहुत भारी चीज़ है। यह न हर किसी को रास आता है और न हर कोई इसका अहल (योग्य) होता है। इसका नूर (प्रकाश) पूरी इंसानियत के लिए है, मगर इस नूर के मआदिन व मसा दिर (स्रोत और खदानें) कुछ चुनिंदा सीने ही हैं। इस इल्म का हक़ यह है कि इसकी हैबत (महिमा/मर्यादा) बाक़ी रखी जाए, इसे रुसवा (अपमानित) न होने दिया जाए। आ'मश ने जब शुअबा को देखा कि वह कुछ नाक़द्रों (मूल्य न समझने वालों) को हदीस पढ़ा रहे हैं, तो फ़रमाया: "तेरा बुरा हो, तू ख़िंजीरों (सूअरों) के गले में मोती पिरो रहा है?!" ज़माना जितना नूरे नबुव्वत (पैग़ंबरी के प्रकाश) से दूर होता गया, मीरासे नबुव्वत (पैग़ंबरी की विरासत) पर सेंध लगाने वाले वारादाती (धोखेबाज़) भी बढ़ते गए। एक दिन मदीना के इमाम, रबीआ बिन अब्दुर रहमान रो पड़े। कहने लगे कि आम चोर-उचक्कों से ज़्यादा ये वारादाती जेल के हक़दार हैं जो नाहक़ (अवैध रूप से) इल्म की सरहदों को लांघते हैं। हालांकि यह वह दौर था जब कोई आलिम (विद्वान) बोलता था तो उसका सामना आलिम से ही होता था, और ख़्वास (विशेषज्ञों) की बात ख़्वास तक ही सीमित रह जाती थी। मगर अब आलिम की आज़माइश (परीक्षा) यह है कि उसके शुभचिंतकों में दवा बेचने वाले भी हैं और मंजन बेचने वाले भी, किताब बेचने वाले भी और क़लम बेचने वाले भी, ज़मीन बेचने वाले भी और ज़मीर बेचने वाले भी, मदरसे के मोहतमिम (प्रबंधक) भी और स्टूडियो के मुंतज़िम (मैनेजर) भी। 'ما أشدّ غربة العالِم' (आलिम का अकेलापन कितना गंभीर है)!! स्क्रीन (सोशल मीडिया/इंटरनेट) के आने के बाद यह तमन्ना करना कि इल्म की हुर्मत (पवित्रता/मर्यादा) की हिफ़ाज़त हो सके, महाल (असंभव) है। बल्कि यह कहना भी आज जुर्म मान लिया गया है कि ' can'टी वी लीव इल्म फॉर इल्म वाले' (ख़ुदा के लिए इल्म को इल्म वालों के लिए रहने दो)। कुछ कोढ़-मग़्ज़ (कमअक्ल) बुद्धिजीवी इसे 'पोपशाही' (पादरीवाद) का नाम देंगे, तो कुछ नाज़ुक-मिज़ाज विचारक इसे अहंकार (तकब्बुर) कहेंगे। इसलिए अब दुनिया की रस्म और वक़्त का दस्तूर यही बन चुका है कि इल्म से जुड़े लोगों (मंसूबीन-ए-इल्म) से की जाने वाली ख़ास बातें भी खुलेआम दीवार पर (यानी सरेआम) लिख दी जाएं। पस क़िस्सा मुख़्तसर (संक्षेप में) यह है भाइयों, कि ब-हैसियत तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी होने के नाते) इस बात को जितनी जल्दी समझ लें उतना अच्छा है, कि इस रंग व बू की दुनिया में आपके सामने आने वाला हर शख़्स आपका मुक़ाबिल (समकक्ष या प्रतिद्वंद्वी) नहीं है। ये सब इंजीनियर, डॉक्टर, स्पीकर और पत्रकार वग़ैरह वो आम लोग (अवाम) हैं जिनका शरई फ़र्ज़ आपके आस्ताने पर अपने (आत्मिक) मर्ज़ की दवा लेने आना था, मगर ये बेचारे खुद अपने क्लिनिक खोलकर बैठ गए हैं। लेकिन आप अपनी क़द्र (मूल्य) को पहचानें और अपनी गरिमा को कम न होने दें। अगर ये चंद बातें समझ आती हैं तो पल्ले से बांध लें: 1) अइरिफ़िल हक़्क़ा तइरिफ़ अहलहू (اعرف الحق تعرف أهله - हक़ को जानो, हक़ वालों को खुद पहचान जाओगे): जब तालिब-ए-इल्म हक़ को कुछ शख़्सियतों के चश्मे से देखता है, तो लाज़मी तौर पर उसके अरमानों का खून होता है, क्योंकि रसूलुल्लाह (ﷺ) के बाद हर इंसान से ख़ता (ग़लती) होना मुमकिन है। अगर वह फिसलेगा तो क्या आप भी फिसल जाएंगे?! लिहाज़ा हक़ को जानने की कोशिश करें, हक़ वालों को खुद ही पहचान लेंगे। अक़ीदा पढ़ें, किताबें खोलें, इल्म के लिए जूते घिसें, और कामचोरी छोड़ दें। "ताकि जो हलाक हो वह खुली दलील पर हलाक हो और जो ज़िंदा रहे वह खुली दलील पर ज़िंदा रहे!" वरना आप यही समझते रह जाएंगे कि डिबेट (बहसबाजी) को तरीक़ा-ए-सलफ़ (पूर्वजों के तरीक़े) के ख़िलाफ़ कहना मदीना यूनिवर्सिटी वालों की ईजाद है, और बदअती (ढोंगी/नवाचारी) से दूरी बनाना किताब व सुन्नत में नहीं है, और हाथी उड़ता है, और इंसान पहले बंदर थे, और हक़ उसी तरफ़ होता है जिस तरफ़ महंगा कैमरा हो। वग़ैरह-वग़ैरह। 2) बय्यिनिस सुन्नता वला तुख़ासिम अलैहा (بين السنة ولا تخاصم عليها - सुन्नत को बयान कर दो और उस पर झगड़ा मत करो): अहले सुन्नत का मन्हज (तरीक़ा) बयान कर दो और झगड़े से दूर रहो। मुहद्दिस अल्बानी (रह.) कहा करते थे: "क़ुल कलिमतका वमशि" (अपनी बात कहो और चल पड़ो)। किस-किस को पूरा पड़ोगे? किस-किस से सींग फंसाओगे? बकरी आपसे बेहतर 'मैं-मैं' कर लेती है, और बैल आपसे बेहतर टक्करें मार लेता है; तो क्या आप बकरी और बैल को मन्हज सिखाने बैठ जाएंगे?! तालिब-ए-इल्म जब चोंच लड़ाने (बहस करने) का आदी हो जाता है, तो वह अंधेरों में जा गिरता है, उसका सफ़र रुक जाता है, और जो बात अल्लाह के लिए करनी होती है, वह नफ़्स की जीत (अहंकार की लड़ाई) के मअरके में बदल जाती है। 3) मन जअला दीनाहू ग़रज़न लिल-ख़ुसूमाति अक्सरात तनक्कुल (من جعل دينه غرضا للخصومات أكثر التنقل - जिसने अपने दीन को झगड़ों का निशाना बनाया, वह बार-बार अपने स्टैंड बदलता रहेगा): जो दीन को झगड़ों और रोज़-रोज़ की तू-तू मैं-मैं के चश्मे से समझता है, वह बिना पेंदे का लोटा होता है। लोटा न बनें, मज़बूत पैरों पर खड़े हों। यह दीन तब भी था जब फ़ेसबुक नहीं था। उस तालिब-ए-इल्म पर अफ़सोस है जो बहस व तक़्रार के वक़्त पहली सफ़ (लाइन) में हो और तालीम व तअल्लुम (पढ़ने-पढ़ाने) के वक़्त नज़र भी न आए। इमाम मालिक (रह.) से एक बुद्धिजीवी ने कहा, "मैं आपसे मुनाज़रा (शास्त्रार्थ) करना चाहता हूँ। अगर मैं जीता तो आप मेरे स्टैंड पर आ जाना, और आप जीते तो मैं आपकी राय अपना लूंगा।" इमाम साहब ने फ़रमाया: "कल अगर तुमसे बड़ा कोई बुद्धिजीवी आकर हमसे जीत गया, तो क्या हम उसके पीछे चल पड़ेंगे?! यह कौन सा दीन है? अल्लाह का दीन तो एक ही है जिसमें कोई रंगबाज़ी (पैंतरेबाज़ी) नहीं!" 4) मा काना लिल्लाहि यबक़ا (ما كان لله يبقى - जो अल्लाह के लिए होता है, वही बाक़ी रहता है): यह अस्लुल उसूल (सिद्धांतों का मूल) और सुल्लमुल वूसूल (मंज़िल तक पहुँचने की सीढ़ी) है। यह अव्वल भी है और आख़िर भी, कि अल्लाह के साथ सच्चे हो जाएं। फिर चाहे आप किसी का रद्द् (खंडन) करें या दिफ़ा (बचाव)। लाखों के मजमे (भीड़) से ख़िताब (भाषण) करें या किसी गाँव की कच्ची मस्जिद में बैठकर 'नूरानी क़ायदा' पढ़ाएं। क्योंकि यह इल्म अल्लाह के साथ मुआमले का नाम है। इमाम राज़ी ने शहाबुद्दीन ग़ोरी से कहा था: "न तेरी सल्तनत बाक़ी रहेगी और न राज़ी की बातें, बेशक हम सबको अल्लाह ही की तरफ़ लौटकर जाना है!" सल्तनत काम आएगी न व्यूज़ (Views), सिर्फ़ इख़्लास (निष्ठा) और मुताबाअत (पैग़ंबर के अनुसरण) की क़ीमत पड़ेगी। "और हर जान को देखना चाहिए कि उसने कल (आख़िरत) के लिए क्या आगे भेजा है!" (अब्दुल अज़ीज़ नासिर) ____________📝📝____________ मनक़ूल (साभार)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप। ____________📝📝____________