Superhit Kalam 2026 - Sahaba Ka Parcham Uthay Chala Chal - By Mufti Abdullag Bin Abbas

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एक ही सफ़ (कतार) में खड़े हो गए महमूद व अयाज़ (इस्लामी न्याय की मिसाल)

एक ही सफ़ (कतार) में खड़े हो गए महमूद व अयाज़ (इस्लामी न्याय की मिसाल)

इमाम अबू यूसुफ (रह.) खलीफा हारून रशीद के ज़माने में पूरे इस्लामी जगत के मुख्य न्यायाधीश (काज़ी-उल-कुज़ात) थे। एक बार उनके पास खलीफा हारून रशीद और एक ईसाई नागरिक का मुकदमा आया। इमाम ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला ईसाई के हक में सुनाया। इस तरह के सुनहरे और रोशन वाकयात इस्लामी इतिहास के पन्ने-पन्ने पर बिखरे पड़े हैं। लोग अक्सर उस दौर को "शाही शासन (दौरे-मलूकियत)" कहते हैं, मगर वह कितना मुबारक शाही दौर था, जहाँ एक शक्तिशाली राजा और खलीफा अपनी ही प्रजा के एक गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ अदालत के कटहरे में एक सामान्य पक्षकार बनकर हाजिर होता है। जब इमाम अबू यूसुफ (रह.) की वफ़ात (मृत्यु) का समय करीब आया, तो वे दुआ करते हुए कहने लगे: "ऐ अल्लाह! तू जानता है कि मैंने अपने न्याय सेवा के दौर में मुकदमों के फैसले करते समय कभी भी किसी पक्ष की तरफदारी नहीं की। यहाँ तक कि मेरे दिल में कभी किसी एक पक्ष के प्रति झुकाव भी पैदा नहीं हुआ, सिवाय ईसाई और हारून रशीद के मुकदमे के। उस मुकदमे में मेरे दिल का रुझान और तमन्ना यह थी कि हक हारून रशीद के पास हो और फैसला सच्चाई के मुताबिक उन्हीं के पक्ष में जाए, लेकिन दोनों पक्षों की दलीलें और सबूत सुनने के बाद मैंने फैसला हारून रशीद के खिलाफ सुनाया।" यह कहकर इमाम अबू यूसुफ (रह.) रोने लगे और वे इस कदर रोए कि उनका दिल भर आया। (संदर्भ: अल-दुर्र अल-मुख्तार: भाग 3, पृष्ठ 313 / अल-कज़ा फिल-इस्लाम आरिफ अल-निकदी द्वारा, पृष्ठ 20 | किताब: किताबों की दरसगाह में, पृष्ठ संख्या: 57, लेखक: इब्न अल-हसन अब्बासी — चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)