New Naat Sharif | Aap Hain Rahbar Huzur | Aap Ka Mai Ummati Hoon | Abdul Haseeb

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Naats

आख़िरी सफ़र की पुकार

आख़िरी सफ़र की पुकार

सालिहीन (नेक लोगों) में से एक शख़्स रोज़ाना शहर की दीवार पर खड़े होकर रात में यह आवाज़ लगाता था, "चलो, क़ाफ़िले के चलने का वक़्त आ गया है"। जब उनका इंतक़ाल (निधन) हो गया, तो शहर के हाकिम (शासक) को यह आवाज़ सुनाई नहीं दी। तहक़ीक़ (जांच) करने पर पता चला कि उनकी वफ़ात हो गई है, तो अमीर (शासक) ने ये अशआर (काव्य पंक्तियाँ) पढ़े: مَا زَالَ يَلْهَجُ بِالرَّحِيلِ وَذِكْرِه حَتَّى انَاخَ بِبَابِهِ الْجَمَّالُ فَأَصَابَهُ متیقظا مُتَشَمِّرًا ذَا أَهْبَةٍ لَمْ تُلْهِهِ الْآمَالُ अशआर का अनुवाद: "वह बराबर कूच (प्रस्थान) की आवाज़ और उसके ज़िक्र से दिलचस्पी लेता रहा, यहाँ तक कि ख़ुद उसके दरवाज़े पर ऊँटवान (मौत के फ़रिश्ते की तरफ इशारा है) ने पड़ाव डाला। चुनांचे उसने उसे बेदार (जागा हुआ), मुस्तैद (सतर्क) और तैयार पाया; झूठी आरज़ूएं उसे ग़ाफ़िल (लापरवाह) न कर सकीं।" (अत-तज़किरह फ़ी अहवालिल मौता वल आख़िरह, १०) किताब: अल्लाह से शर्म कीजिए (सफ़्हा १९२) लेखक: मुफ़्ती सलमान मंसूरपुरी चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप