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अल्लामा इब्न-ए-हजर हैतमी रहमतुल्लाही अलैहि की किताब है "अज़-ज़वाज़िर अन इक़्तिराफ़िल कबाइर"। इसमें उन्होंने एक वाक़िया लिखा है: एक शख़्स हज के इरादे से गया और जब हज करने लगा तो उसने मक्का में पूछा कि सबसे अमानतदार शख़्स कौन है? तो बतलाया गया कि फ़लाँ शख़्स है। तो वह उसके पास गया और अपने एक हज़ार दीनार उसके पास रखवा दिए। दीनार रखवाकर वह अपने हज के अह्कामात (नियमों) को अदा करने लगा। जब हज मुकम्मल (पूरा) हो गया, तो वह उसके घर गया ताकि मैं अपनी अमानत वापस ले लूँ। जब वहाँ पहुँचा तो पता चला कि उस शख़्स का इंतक़ाल हो गया है। तो उसने कहा कि मैंने तो एक हज़ार दीनार दिए थे, अब मुझे मेरे दीनार कैसे मिलेंगे? तो उसकी औलाद ने कहा, "उन्होंने हमें नहीं बताया कि उन्होंने दीनार कहाँ रखे हैं।" घर में काफ़ी तलाश किया लेकिन दीनार न मिले। तो यह वहाँ के उलेमा (विद्वानों) के पास गया और पूछा कि मैंने इतनी बड़ी रक़म दी थी, उनका इंतक़ाल हो गया, यह मेरी रक़म कैसे मिलेगी? तो एक शख़्स ने यह बताया कि, "तुम ज़मज़म के कुएँ के पास जाकर एक आवाज़ लगाना, आधी रात के बाद तहज्जुद के वक़्त कहना कि मैंने फ़लाँ शख़्स को अमानत दी थी। अगर वह नेकोकार (पुण्यात्मा) होगा, तो बमुश्किल तजुर्बाती बात यह है कि उसकी रूह को अल्लाह वहाँ पहुँचा देता है और वह जवाब दे देता है।" तो वह शख़्स वहाँ गया और आवाज़ दी, लेकिन उसको जवाब न मिला। फिर उसने (आकर) कहा कि मुझे जवाब तो नहीं मिला, तो उन्होंने कहा, "तुम यमन में जाओ- वहाँ एक कुँआ है उसका नाम है 'चाह-ए-बरहूत' (बरहूत का कुँआ), वहाँ जाकर आवाज़ दो। वहाँ जहन्नमियों की रूहें जमा होती हैं, वहाँ तुम्हें पता चल जाएगा।" यह शख़्स वहाँ पहुँचा। इब्न-ए-हजर हैतमी रहमतुल्लाही अलैहि लिखते हैं कि वहाँ उसने आवाज़ दी तो उसको जवाब मिला कि, "तुम्हारी रक़म मैंने अपने घर में फ़लाँ जगह पर दफ़नाई हुई है, वहाँ से ले लो।" तो उसने पूछा कि, "आख़िर तुमने दफ़नाई क्यों? अपने रिश्तेदारों, बीवी और बच्चों के पास क्यों नहीं रखवाई?" उसने कहा, "मुझे अपने बच्चों पर एतमाद (भरोसा) नहीं था। मैंने सोचा कहीं ऐसा न हो कि ये लोग ख़यानत (धोखाधड़ी) कर लें, इसलिए मैंने वहाँ रखी है। वहाँ से जाकर ले लो।" उसने कहा, "तुम तो बड़े नेक आदमी थे, लेकिन तुम्हारी रूह का सामना मुझे चाह-ए-बरहूत पर हो रहा है, जहाँ जहन्नमियों की रूहों का इज्तिमा (जमावड़ा) होता है?" उसने कहा, "बात यह है कि मैं था तो बड़ा नेक आदमी, सोम-ओ-सलात (रोज़े और नमाज़) का बड़ा पाबंद था: कान ली उख़्तुन फ़क़ीरतुन हजरतुहा व कुन्तु ला अहनू अलैहा फ़-आक़ब नियल्लाहु तआला। लेकिन अल्लाह ने मुझे इस वजह से सज़ा दी कि मेरी बहन ग़रीब थी, मैंने उसके साथ तआवुन (सहयोग) नहीं किया, क़ता-ए-रहमी (रिश्तेदारी तोड़ना) की। अल्लाह ने क़ता-ए-रहमी की वजह से मुझे जहन्नम में डाल दिया।" देखें, यह बड़ा नेक शख़्स था, नेकोकारी में उसका बड़ा चर्चा था, लोग अमानतें उसके पास रखवाते थे, लेकिन क़ता-ए-तअल्लुक़ी (रिश्ता तोड़ने) की वजह से अज़ाब में गिरफ़्तार हो गया। जैसे ज़िंदगी में सिला-रहमी (रिश्तेदारों से अच्छा व्यवहार) का हुक्म है, इसी तरह दुनिया से जाने के बाद भी वालिदैन (माता-पिता) के दोस्तों के साथ हुस्न-ए-सुलूक (अच्छा बर्ताव) से पेश आना चाहिए। ------------------------------------------------------- किताब: नेक आमाल को ज़ाया करने वाले गुनाह (पृष्ठ: 222-223) लेखक: मौलाना मोहम्मद नोमान साहब नक़ल कर्ता: अनस मैमन पालनपुरी
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