Heart Touching Naat - Paikr E Husnon Lataafat - Furqan Wazir - Anas Shamsi - Woh Sarapa E Jamaal

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Naats

एक वकील का इब्रतनाक़ (शर्मनाक) अंजाम

एक वकील का इब्रतनाक़ (शर्मनाक) अंजाम

एक वकील साहब अदालतों में लोगों की पहली पसंद (ترجیح) होते थे। फीस लाखों में थी... बड़े-बड़े अपराधियों (मुजरिमों) को बरी करवा लिया करते थे... आइए! अब उनका इब्रतनाक़ (عبرتناک - शिक्षाप्रद/शर्मनाक) अंजाम पढ़िए... फिर वक़्त बदलता है, उनकी उम्र ढल जाती है और वह बूढ़े हो जाते हैं। आँखों की रोशनी (بینائی) इस हद तक कम हो जाती है कि सामने खड़ी अपनी सगी बेटी तक को नहीं पहचान सकते.. सारा रुपया-पैसा औलाद आपस में बाँट लेती है... बेटे अपनी बीवियों और बच्चों को लेकर यूरोप में सेट हो जाते हैं... वकील साहब घर में अकेले रह जाते हैं। औलाद चूंकि मफ़लूमों (पीड़ितों) से धोखे से हथियाई गई दौलत पर पली-बढ़ी होती है या ज़ालिमों का ज़ुल्म छुपाने के लिए दी गई दौलत पर जवान हुई होती है... लिहाज़ा उसमें मुरव्वत (इंसानियत/शर्म) नाम की कोई चीज़ नहीं होती... बाप को साथ रखने के लिए कोई भी राज़ी नहीं होता। फिर सर्वसम्मति से (متفقہ) फ़ैसला होता है कि वालिद साहब (पिता) के लिए 24 घंटे का एक मुलाज़िम (नौकर) और एक सिक्योरिटी गार्ड का इंतज़ाम किया जाए... ज़ालिमों के लिए ढाल बनकर मफ़लूमों को इंसाफ़ की दहलीज़ से ख़ाली हाथ वापस मोड़ देने वाला वकील इस तरह नौकरों के सहारे ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हो जाता है। पिछले दिनों उनका बड़ा बेटा अपनी बीवी-बच्चों के हमराह (साथ) अपनी साली (نسبتی بہن) की शादी पर पाकिस्तान आया हुआ था... रिश्तेदारों ने उसे शर्मिंदा करके अपने वालिद से मिलने पर मजबूर कर दिया... वह अपनी बीवी और बच्चों के साथ अपने बाप से मिलने उसके घर आया... उनके बाप के कमरे से शदीद (भयानक) बदबू आ रही थी क्योंकि कई बार वह रात को उठकर टॉयलेट नहीं जा पाते थे.. नौकरों को आवाज़ देते तो वे सुनी-अनसुनी कर देते और इस तरह पेशाब बिस्तर पर ही निकल जाता था... बिस्तर धोना तो दूर की बात, नौकर बिस्तर बदलना भी मुनासिब नहीं समझते थे... इस तरह वकील साहब उसी बदबूदार गीले बिस्तर पर पड़े ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर थे... जब उनका बेटा कमरे में दाख़िल हुआ, तो नाक पर रुमाल रखकर बिना बाप से मिले ही वापस मुड़ गया... चूंकि उनको (बाप को) दिखाई नहीं देता था, लिहाज़ा उनका बेटा बाहर गया और सिक्योरिटी गार्ड को समझा-बुझाकर कमरे के अंदर भेजा... नौकर ने जाकर बूढ़े वकील को गले लगा लिया और बूढ़ा बेचारा नौकर को ही अपना बेटा समझकर चूमता रहा... बाद में नौकरानी और उसके बच्चे वकील साहब की बहू और पोते-पोतियां बनकर उनसे मिलते रहे... वकील साहब उन्हें अपना ख़ून समझकर दुआएँ देते रहे। उनके बेटे ने तो बाप के क़रीब जाना भी मुनासिब नहीं समझा.. बेटे के इस तरह का रवैया अपनाने में किसी और का नहीं, बल्कि निस्संदेह (بلا شبہ) वकील साहब का अपना ही हाथ था। सबसे पहली चीज़ यह समझ आई कि माल और औलाद आज़माइश और फ़ितना (मुसीबत) कैसे बनते हैं?... दूसरी चीज़ यह समझ आई कि पेशा कोई भी अपनाओ, मगर कभी ज़ालिम के साथ खड़े न होओ... यक़ीनन यह काम वकील साहब नहीं कर सके। मगर मेरी ख़्वाहिश है कि इस सच्चे वाक़िये (घटना) को पढ़ने वाले लोग ज़रूर इन हक़ायक़ (सच्चाइयों) का ख़याल करें, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए... वकील साहब का वक़्त तो गुज़र गया, मगर हमारा और आपका वक़्त अभी मौजूद है। (माहनामा मुहासिने इस्लाम, सितंबर / पृष्ठ: 11) (सौजन्य से: इस्लामिक ट्यूब)