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'रहमान' और 'रहीम' नाम के उपयोग के शरई अहकाम

'रहमान' और 'रहीम' नाम के उपयोग के शरई अहकाम

"रहमान" शब्द का प्रयोग अल्लाह तआला के अलावा किसी और के लिए करना जायज़ नहीं है, बल्कि हराम है। अगर कोई व्यक्ति किसी इंसान को "रहमान" कहे तो यह शिर्क है, क्योंकि अल्लाह तबारक व तआला के अलावा कोई भी ऐसा नहीं हो सकता जिसकी रहमत (दया) इतनी विशाल हो। इसलिए किसी और को रहमान या अर-रहमान कहना जायज़ नहीं है। इससे यह भी मालूम हो गया कि आजकल हमारे समाज में जो गलत रिवाज पड़ गया है कि अगर किसी का नाम अब्दुल रहमान है, तो उसे संक्षिप्त (abbreviate) करके "रहमान साहब!" कह दिया जाता है, यह बहुत गलत बात है। रहमान शब्द अल्लाह तबारक व तआला की ज़ात के अलावा किसी और के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता। इसलिए अगर किसी का नाम अब्दुल रहमान है, तो उसका पूरा नाम अब्दुल रहमान ही लेना चाहिए। केवल रहमान कहकर उसे संबोधित करना या उसका हवाला देना सही नहीं है, और अंदेशा (डर) है कि अनजाने में यह इंसान को कहीं शिर्क के करीब न ले जाए (अल्लाह तआला इससे हम सबकी रक्षा करे)। इसलिए इससे बहुत ज़्यादा बचने की ज़रूरत है। इसी तरह अल्लाह तआला के वे नाम या वे सिफ़ात (गुण) जो सिर्फ अल्लाह तआला के साथ खास हैं, जैसे अल-ग़फ़्फ़ार, अल-क़ह्वार, अल-ख़ालिक़ वग़ैरह, उनमें भी यह एहतियात (सावधानी) रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर किसी का नाम अब्दुल ख़ालिक़ हो, तो उसे सिर्फ "ख़ालिक़" कहकर बुलाना सही नहीं है। अलबत्ता, "रहीम" शब्द इस मामले में "रहमान" से अलग है, क्योंकि रहीम का अर्थ होता है जिसकी रहमत पूरी और मुकम्मल हो। चूंकि यह गुण अल्लाह तआला की रचना के कारण किसी इंसान में भी हो सकता है कि जब कोई इंसान किसी दूसरे इंसान के साथ रहम का मामला करे तो पूरी रहमत का मामला करे, इसलिए रहीम शब्द का इस्तेमाल अल्लाह तआला के अलावा किसी व्यक्ति के लिए करना जायज़ है। खुद क़ुरआन करीम ने फ़रमाया है: "लोगो! तुम्हारे पास एक ऐसा रसूल आया है जो तुमहीं में से है, जिसे तुम्हारी हर तकलीफ़ बहुत भारी मालूम होती है, जिसे तुम्हारी भलाई की धुन लगी हुई है, जो मोमिनों के लिए अत्यंत शफ़ीक़ (दयालु) और बेहद मेहरबान (रहीम) है।" यहाँ पर हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को "रहीम" फ़रमाया गया है, जिसका अर्थ है कि आप रहम करने वाले हैं और आपकी रहमत जिस पर भी है, पूरी है। लिहाज़ा इससे साबित हुआ कि किसी इंसान के लिए भी रहीम शब्द का इस्तेमाल हो सकता है, हालाँकि इसका सही और वास्तविक हक़दार अल्लाह तआला ही हैं, लेकिन इसके शाब्दिक अर्थ में इसे ग़ैर-अल्लाह (अल्लाह के अलावा) के लिए इस्तेमाल करना भी जायज़ है। (मासिक अल-बलाग़, जनवरी 2024, पृष्ठ संख्या: 13, 14)