हदीस अल-रसूल ﷺ

قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ أَلاَ أَدُلُّكُمْ عَلَى أَهْلِ الْجَنَّةِ، كُلُّ ضَعِيفٍ مُتَضَعَّفٍ، لَوْ أَقْسَمَ عَلَى اللَّهِ لأَبَرَّهُ، وَأَهْلِ النَّارِ كُلُّ جَوَّاظٍ عُتُلٍّ مُسْتَكْبِرٍ ‏"‏‏.‏(بُخاری شریف۔ ۶۶۵۷)
अनुवाद
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पूछा: "क्या मैं तुमको जन्नती न बतलाऊँ? (वह) हर कमज़ोर, कमज़ोर गरदाना हुआ है, अगर अल्लाह पर क़सम खा ले तो अल्लाह तआला ज़रूर उसकी क़सम पूरी करें (और अल्लाह की सिफ़ात बन्दों को अपनानी चाहिए, इसी लिए अब्रार-अल-मुक़सिम मुस्तहब है) और क्या मैं तुम्हें दोज़ख़ी न बतलाऊँ? वह हर अक्खड़ मिज़ाज, अकड़ कर चलने वाला, घमंडी है!" (तोहफ़त-उल-क़ारी)
दुनिया की हक़ीक़त और आख़िरी सफ़र की तैयारी
लेख

दुनिया की हक़ीक़त और आख़िरी सफ़र की तैयारी

रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाया करते थे: "मेरा दुनिया से क्या तअल्लुक़ (संबंध)? मेरी दुनिया की मिसाल तो ऐसी ही है कि जैसे कोई सवार किसी दरख़्त (पेड़) के साए में (दम लेने के लिए) ठहर जाए, फिर उसे छोड़ कर चला जाए।" हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों को वसीयत फ़रमाई: "(दुनिया से) गुज़र जाओ, इसे आबाद करने में न लग...

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