عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : كُلُّ الْمُسْلِمِ عَلَى الْمُسْلِمِ حَرَامٌ ، دَمُهُ ، وَمَالُهُ ، وَعِرْضُهُ(ابن ماجہ:۳۹۳۳)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "हर मुसलमान दूसरे के लिए क़ाबिले एहतराम (सम्माननीय) है, यानी उसकी जान, उसका माल और उसकी आबरू।"