नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "अगर मैं अपनी उम्मत पर दुश्वार न समझता तो मैं इशा को तिहाई रात या आधी रात तक देर कर के पढ़ने का हुक्म देता।"
एक नौजवान अपनी ज़िंदगी के मामलात से काफ़ी परेशान था। एक रोज़ एक दरवेश से मुलाक़ात हो गई तो अपना हाल कह सुनाया। कहने लगा कि बहुत परेशान हूँ। यह दुख और परेशानियाँ अब मेरी बर्दाश्त से बाहर हैं। लगता है शायद मेरी मौत ही मुझे इन ग़मों से निजात दिला सकती है।
दरवेश ने उसकी बात सुनी और कहा, "जाओ और नमक ल...