हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : مَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا ، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ، وَمَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا ، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ (بُخاری شریف:۱۹۰۱)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से मरवी है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: जो कोई शब-ए-क़द्र में ईमान के साथ और हुसूल-ए-सवाब की नीयत से इबादत में खड़ा हो, उसके तमाम अगले गुनाह बख़्श दिए जाएँगे, और जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ और सवाब की नीयत से रखे, उसके अगले तमाम गुनाह मुआफ़ कर दिए जाएँगे।
झूठी उम्मीद और अधूरे वादे का घातक अंजाम
लेख

झूठी उम्मीद और अधूरे वादे का घातक अंजाम

एक आदमी कई रातें सख्त सर्दी में आराम से सोता रहा। एक दिन किसी राहगीर ने गुजरते हुए उससे कहा: "मैं तुम्हें एक गर्म रज़ाई लाकर दूंगा"!! वह राहगीर अपनी मंज़िल को चला गया और रज़ाई लाने का वादा भूल गया, बूढ़ा आदमी उसका इंतज़ार करते हुए सर्दी से मर गया। लोगों को उसकी लाश के पास एक लिखा हुआ पर्चा (नोट)...

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