عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : مَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا ، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ، وَمَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا ، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ (بُخاری شریف:۱۹۰۱)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से मरवी है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: जो कोई शब-ए-क़द्र में ईमान के साथ और हुसूल-ए-सवाब की नीयत से इबादत में खड़ा हो, उसके तमाम अगले गुनाह बख़्श दिए जाएँगे, और जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ और सवाब की नीयत से रखे, उसके अगले तमाम गुनाह मुआफ़ कर दिए जाएँगे।