हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ، ‏‏‏‏‏‏عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ‏‏‏‏‏‏قَالَ:‏‏‏‏ الْتَمِسُوهَا فِي الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ مِنْ رَمَضَانَ، ‏‏‏‏‏‏فِي تَاسِعَةٍ تَبْقَى، ‏‏‏‏‏‏وَفِي سَابِعَةٍ تَبْقَى، ‏‏‏‏‏‏وَفِي خَامِسَةٍ تَبْقَى(ابو داؤد: ۱۳۸۱)
अनुवाद
हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि.) नबी (ﷺ) से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया: "लैलत-उल-क़द्र को रमज़ान की आख़िरी दस (रातों) में तलाश करो। आख़िरी नौवीं, सातवीं और पाँचवीं रात में।"
मेरे आदरणीय पिता का घरेलू और पारिवारिक जीवन
लेख

मेरे आदरणीय पिता का घरेलू और पारिवारिक जीवन

लेखक: मौलाना मोहम्मद सईद पालनपुरी शिक्षक: जामिया अल-इमाम मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी, देवबंद मेरे आदरणीय पिता हज़रत मौलाना मुफ़्ती सईद अहमद साहब पालनपुरी, पूर्व शेख-उल-हदीस और सदरुल मुदर्रिसीन (प्रधान शिक्षक) दारुल उलूम देवबंद की वफ़ात (देहांत) के बाद से इस लेख को लिखने के समय तक लेख लिखने का सिल...

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