हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ صُهَيْبٍ ، قَالَ : سَمِعْتُ أَنَسًا ، يَقُولُ : كَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا دَخَلَ الْخَلَاءَ ، قَالَ : اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ (بُخاری:۱۴۲)
अनुवाद
हज़रत अनस (रज़ि.) फ़रमाते हैं कि रसूले करीम (ﷺ) जब (क़ज़ा-ए-हाजत के लिए) बैत-उल-ख़ला में दाख़िल होते तो यह (दुआ) पढ़ते: اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ ऐ अल्लाह! मैं नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों से तेरी पनाह माँगता हूँ।
कारोबारी लाइन में मर्द-ओ-ज़न का इख़्तिलात
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कारोबारी लाइन में मर्द-ओ-ज़न का इख़्तिलात

मलफ़ूज़ात : हज़रत मौलाना मोहम्मद हकीम अख्तर साहब रहमतुल्लाह अलैह - व्यापारिक (کاروباری) लाइन में भी मर्द और औरत का इख़्तिलात (मेल-जोल) उरूज (चरम) पर है, देखिए! अव्वल (पहले) तो ऐसी रोज़ी तलाश करे जिसमें गुनाह का अंदेशा न हो, औरतों से साबक़ा (सामना) न हो, चाहे रोज़ी कम हो, पत्थर बांधकर भी अगर ख़ुद...

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