हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ الرَّبِيعِ بْنِ سَبْرَةَ الْجُهَنِيِّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ: أَمَرَنَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِالْمُتْعَةِ عَامَ الْفَتْحِ، حِينَ دَخَلْنَا مَكَّةَ، ثُمَّ لَمْ نَخْرُجْ مِنْهَا حَتَّى نَهَانَا عَنْهَا(مسلم:۱۴۰۶)
अनुवाद
अब्दुल मलिक बिन रबी बिन सबरा अल-जुहनी ने अपने पिता के हवाले से अपने दादा (सबरा बिन माबद रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत की, उन्होंने कहा: मक्का विजय के वर्ष जब हम मक्का में दाखिल हुए, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें (निकाह) मुताह (की अनुमति) का हुक्म दिया, फिर अभी हम वहाँ से निकले भी नहीं थे कि आपने हमें इससे मना फ़रमा दिया।
बिना सोचे-समझे बोले गए शब्दों का ज़हर और रिश्तों की तबाही
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बिना सोचे-समझे बोले गए शब्दों का ज़हर और रिश्तों की तबाही

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