हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ وَابْنِ عُمَرَ يَرْفَعَانِ الْحَدِيثَ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ لَا يَحِلُّ لِلرَّجُلِ أَنْ يُعْطِيَ الْعَطِيَّةَ ثُمَّ يَرْجِعَ فِيهَا إِلَّا الْوَالِدَ فِيمَا يُعْطِي وَلَدَهُ(ابنِ ماجہ: ۲۳۷۷)
अनुवाद
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: "आदमी के लिए जायज़ नहीं कि (किसी को) कोई चीज़ देकर वापस ले ले, सिवाय पिता के, जो कुछ वह अपनी औलाद को देता है, (उसे वापस ले सकता है)।"
आख़िरी सफ़र की पुकार
लेख

आख़िरी सफ़र की पुकार

सालिहीन (नेक लोगों) में से एक शख़्स रोज़ाना शहर की दीवार पर खड़े होकर रात में यह आवाज़ लगाता था, "चलो, क़ाफ़िले के चलने का वक़्त आ गया है"। जब उनका इंतक़ाल (निधन) हो गया, तो शहर के हाकिम (शासक) को यह आवाज़ सुनाई नहीं दी। तहक़ीक़ (जांच) करने पर पता चला कि उनकी वफ़ात हो गई है, तो अमीर (शासक) ने ये अशआ...

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