हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ زَيْدِ بْنِ خَالِدٍ الْجُهَنِيِّ، ‏‏‏‏‏‏أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ سُئِلَ عَنِ اللُّقَطَةِ، ‏‏‏‏‏‏فَقَالَ:‏‏‏‏ عَرِّفْهَا سَنَةً فَإِنْ جَاءَ بَاغِيهَا فَأَدِّهَا إِلَيْهِ، ‏‏‏‏‏‏وَإِلَّا فَاعْرِفْ عِفَاصَهَا وَوِكَاءَهَا ثُمَّ كُلْهَا فَإِنْ جَاءَ بَاغِيهَا فَأَدِّهَا إِلَيْهِ(ابو داؤد: ۱۷۰۶)
अनुवाद
हज़रत ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) से गिरी पड़ी अश्या के मुताल्लिक़ पूछा गया तो आप (ﷺ) ने फ़रमाया: "एक साल तक इसका एलान करो। अगर इसका तलब करने वाला आ जाए तो इसको दे दो, वरना इसकी थैली (या बर्तन) और इसका सरबंद याद रखो, फिर इसे खा लो (अपने इस्तेमाल में ले आओ), इसके बाद अगर इसका मुतलाशी आ जाए तो उसके हवाले कर दो।"
मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब
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मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब

हज़रात-ए-सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में कुछ मसलों पर मतभेद (इख़्तिलाफ़) रहा है; मगर एक-दूसरे के सम्मान (एहतराम) में कभी फ़र्क़ नहीं आया। कौन नहीं जानता कि ख़ून-ए-उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के मसले पर सहाबा-ए-किराम में शदीद (गंभीर) मतभेद हुआ और इसकी वजह से जंग भी हुई; मगर क्या मजाल कि उनके इस...

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