عَنْ زَيْدِ بْنِ خَالِدٍ الْجُهَنِيِّ، أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ سُئِلَ عَنِ اللُّقَطَةِ، فَقَالَ: عَرِّفْهَا سَنَةً فَإِنْ جَاءَ بَاغِيهَا فَأَدِّهَا إِلَيْهِ، وَإِلَّا فَاعْرِفْ عِفَاصَهَا وَوِكَاءَهَا ثُمَّ كُلْهَا فَإِنْ جَاءَ بَاغِيهَا فَأَدِّهَا إِلَيْهِ(ابو داؤد: ۱۷۰۶)
अनुवाद
हज़रत ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) से गिरी पड़ी अश्या के मुताल्लिक़ पूछा गया तो आप (ﷺ) ने फ़रमाया: "एक साल तक इसका एलान करो। अगर इसका तलब करने वाला आ जाए तो इसको दे दो, वरना इसकी थैली (या बर्तन) और इसका सरबंद याद रखो, फिर इसे खा लो (अपने इस्तेमाल में ले आओ), इसके बाद अगर इसका मुतलाशी आ जाए तो उसके हवाले कर दो।"