عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي قَيْسٍ قَالَ سَأَلْتُ عَائِشَةَ كَيْفَ كَانَ نَوْمُ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي الْجَنَابَةِ أَيَغْتَسِلُ قَبْلَ أَنْ يَنَامَ أَوْ يَنَامُ قَبْلَ أَنْ يَغْتَسِلَ قَالَتْ كُلُّ ذَلِكَ قَدْ كَانَ يَفْعَلُ رُبَّمَا اغْتَسَلَ فَنَامَ وَرُبَّمَا تَوَضَّأَ فَنَامَ(نسائی: ۴۰۴)
अनुवाद
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अबू क़ैस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, उन्होंने कहा: मैंने हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से पूछा कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) जनाबत की हालत में कैसे सोते थे? क्या सोने से पहले ग़ुस्ल फ़रमाते थे या ग़ुस्ल से पहले सो जाते थे? उन्होंने फ़रमाया: आप (ﷺ) दोनों तरह कर लेते थे। कभी ग़ुस्ल फ़रमा कर सोते और कभी सिर्फ़ वुज़ू करके सो जाते।