قَالَ: سَمِعْتُ النُّعْمَانَ بْنَ بَشِيرٍ، يَقُولُ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُسَوِّي صُفُوفَنَا حَتَّى كَأَنَّمَا يُسَوِّي بِهَا الْقِدَاحَ حَتَّى رَأَى أَنَّا قَدْ عَقَلْنَا عَنْهُ، ثُمَّ خَرَجَ يَوْمًا فَقَامَ، حَتَّى كَادَ يُكَبِّرُ فَرَأَى رَجُلًا بَادِيًا صَدْرُهُ مِنَ الصَّفِّ، فَقَالَ: «عِبَادَ اللهِ لَتُسَوُّنَّ صُفُوفَكُمْ، أَوْ لَيُخَالِفَنَّ اللهُ بَيْنَ وُجُوهِكُمْ (مسلم:۹۷۹)
अनुवाद
अबू खैसमा ने सिमाक बिन हर्ब से रिवायत की, उन्होंने कहा: मैंने हज़रत नोमान बिन बशीर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से सुना, वह कहते थे: रसूलुल्लाह (ﷺ) हमारी सफ़ों को (इस क़दर) सीधा और बराबर कराते थे, गोया आप उनके ज़रिए से तीरों को सीधा कर रहे हैं, हत्ता कि जब आपको यक़ीन हो गया कि हमने आपसे (इस बात को) अच्छी तरह समझ लिया है तो उसके बाद एक दिन आप घर से निकल कर तशरीफ़ लाए और (नमाज़ पढ़ाने की जगह) खड़े हो गए और क़रीब था कि आप तकबीर कहें (और नमाज़ शुरू फ़रमा दें कि) आपने एक आदमी को देखा, उसका सीना सफ़ से कुछ आगे निकला हुआ था, आपने फ़रमाया: अल्लाह के बंदो! तुम लाज़मी तौर पर अपनी सफ़ों को सीधा करो वरना अल्लाह तुम्हारे रुख़ एक दूसरे के ख़िलाफ़ मोड़ देगा।