हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ صَخْرٍ الْغَامِدِيِّ، ‏‏‏‏‏‏عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ:‏‏‏‏ اللَّهُمَّ بَارِكْ لِأُمَّتِي فِي بُكُورِهَا ، ‏‏‏‏‏‏وَكَانَ إِذَا بَعَثَ سَرِيَّةً أَوْ جَيْشًا بَعَثَهُمْ فِي أَوَّلِ النَّهَارِ، ‏‏‏‏‏‏وَكَانَ صَخْرٌ رَجُلًا تَاجِرًا وَكَانَ يَبْعَثُ تِجَارَتَهُ مِنْ أَوَّلِ النَّهَارِ فَأَثْرَى وَكَثُرَ مَالُهُ (ابو داؤد : ۲۶۰۶)
अनुवाद
हज़रत सख़र गामिदी (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि नबी (ﷺ) ने फ़रमाया: "ऐ अल्लाह! मेरी उम्मत के लिए उनकी सुबहों में बरकत डाल दे।" चुनांचे आप (ﷺ) को कोई मुहिम या लश्कर रवाना करना होता तो उन्हें दिन के पहले पहर रवाना फ़रमाते। और हज़रत सख़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) एक ताज़िर सहाबी थे, तो वह अपने कारिंदों को दिन के पहले पहर रवाना किया करते थे, चुनांचे वह मालदार हो गए थे और उनका माल खूब बढ़ गया था।
गाजा के मशहूर दाई (इस्लामी प्रचारक) और पत्रकार जनाब जिहाद हलिस की पोस्ट देखिए! फरमा रहे हैं:
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"ख़ुदा की क़सम! अगर आप अहल-ए-ग़ज़ा (ग़ज़ा वासियों) पर ढाए जाने वाले मज़ालिम (अत्याचार) और तकलीफ़ें देखें तो आप दंग रह जाएं, ज़ेहन इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएगा कि आख़िर एक इंसान इन तमाम मज़ालिम और तकलीफ़ों को बर्दाश्त करके ज़िंदा कैसे रह सकता है? और इन तकलीफ़ों की शिद्दत (तीव्रता) से उसकी मौत कैसे व...

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