وَعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: أَلَا أَدُلُّكُمْ عَلَى مَا يَمْحُو اللَّهُ بِهِ الْخَطَايَا وَيَرْفَعُ بِهِ الدَّرَجَاتِ؟ قَالُوا بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ: إِسْبَاغُ الْوُضُوءِ عَلَى الْمَكَارِهِ وَكَثْرَةُ الْخُطَى إِلَى الْمَسَاجِدِ وَانْتِظَارُ الصَّلَاةِ بَعْدَ الصَّلَاة فذلكم الرِّبَاط
(مشکوۃ شریف: ۲۸۲)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं, रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: "क्या मैं तुम्हें ऐसा अमल बताऊँ जिसके ज़रिए अल्लाह खताएं माफ़ कर देता है और दर्जात बुलंद करता है?" सहाबा ने अर्ज़ किया: "क्यों नहीं, अल्लाह के रसूल! ज़रूर बताएं।" आप (ﷺ) ने फ़रमाया: "नागवारी के बावजूद मुकम्मल तौर पर वुज़ू करना, मसाजिद की तरफ़ ज़्यादा कदम चल कर जाना और नमाज़ के बाद दूसरी नमाज़ का इंतज़ार करना, यही सरहदी छावनी की हिफ़ाज़त है।" रवाह मुस्लिम।