عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ يَقُولَنَّ أَحَدُكُمُ اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي، اللَّهُمَّ ارْحَمْنِي، إِنْ شِئْتَ. لِيَعْزِمِ الْمَسْأَلَةَ، فَإِنَّهُ لاَ مُكْرِهَ لَهُ "(بُخاری شریف : ۶۳۳۹)
अनुवाद
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: "जब तुम में से कोई दुआ करे तो मज़बूती से मांगे, और हरगिज़ न कहे: ऐ अल्लाह ! आप चाहें तो मुझे दें, आप चाहें तो मेरी बख़्शिश करें, आप चाहें तो मुझ पर मेहरबानी करें, बल्कि मज़बूती से मांगे, क्योंकि उन पर ज़बरदस्ती करने वाला कोई नहीं।" (तुहफ़त-उल-क़ारी)