हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ يَتَمَنَّيَنَّ أَحَدُكُمُ الْمَوْتَ مِنْ ضُرٍّ أَصَابَهُ، فَإِنْ كَانَ لاَ بُدَّ فَاعِلاً فَلْيَقُلِ اللَّهُمَّ أَحْيِنِي مَا كَانَتِ الْحَيَاةُ خَيْرًا لِي، وَتَوَفَّنِي إِذَا كَانَتِ الْوَفَاةُ خَيْرًا لِي(بُخاری شریف: ۵۶۷۱)
अनुवाद
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया: "तुम में से कोई शख़्स हरगिज़ किसी दुख की वजह से मौत की तमन्ना न करे, और अगर मौत की तमन्ना करनी ही है तो कहे: ऐ अल्लाह ! जब तक मेरे लिए ज़िंदगी बेहतर है ज़िंदा रख, और जब मेरे लिए मौत बेहतर हो मुझे दुनिया से उठा ले।" (तुहफ़त-उल-क़ारी)
आधुनिक सुख-सुविधाएं और राजा-महाराजा: कृतज्ञता का पाठ
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