हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَؓ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَمْسٌ تَجِبُ لِلْمُسْلِمِ عَلَى أَخِيهِ رَدُّ السَّلَامِ وَتَشْمِيتُ الْعَاطِسِ وَإِجَابَةُ الدَّعْوَةِ وَعِيَادَةُ الْمَرِيضِ وَاتِّبَاعُ الْجَنَائِزِ(مسلم شريف/ كتاب السلام)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से मरवी (रिवायत) है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इरशाद फ़रमाया: मुसलमान के पाँच हक़ ऐसे हैं जो उसके भाई पर वाजिब हैं, सलाम का जवाब देना, छींकने वाले के जवाब में यरहमुकल्लाह कहना, दावत क़ुबूल करना, मरीज़ की इयादत करना और जनाज़ों के साथ जाना। (तफ़हीम-उल-मुस्लिम/जि: 3)
एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद व अयाज़
लेख

एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद व अयाज़

इमाम अबू यूसुफ रहमतुल्लाह अलैह हारून रशीद के ज़माने में पूरे आलम-ए-इस्लाम के क़ाज़ी-उल-क़ुज़ात (मुख्य न्यायाधीश) थे, एक बार उनके पास ख़लीफ़ा हारून रशीद और एक नसरानी (ईसाई) का मुक़दमा आया, इमाम ने फ़ैसला नसरानी के हक़ में किया, इस तरह के दरख़्शां (चमकदार) वाक़यात तारीख़-ए-इस्लाम के वरक़-वरक़ (पन्ने-प...

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