عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَؓ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَمْسٌ تَجِبُ لِلْمُسْلِمِ عَلَى أَخِيهِ رَدُّ السَّلَامِ وَتَشْمِيتُ الْعَاطِسِ وَإِجَابَةُ الدَّعْوَةِ وَعِيَادَةُ الْمَرِيضِ وَاتِّبَاعُ الْجَنَائِزِ(مسلم شريف/ كتاب السلام)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से मरवी (रिवायत) है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इरशाद फ़रमाया: मुसलमान के पाँच हक़ ऐसे हैं जो उसके भाई पर वाजिब हैं, सलाम का जवाब देना, छींकने वाले के जवाब में यरहमुकल्लाह कहना, दावत क़ुबूल करना, मरीज़ की इयादत करना और जनाज़ों के साथ जाना। (तफ़हीम-उल-मुस्लिम/जि: 3)