हदीस अल-रसूल ﷺ

حَدَّثَنَا أَبُو مَسْعُودٍ قَالَ قَالَ النَّبِيُّ ﷺ ‏"‏إِنَّ مِمَّا أَدْرَكَ النَّاسُ مِنْ كَلاَمِ النُّبُوَّةِ الأُولٰى إِذَا لَمْ تَسْتَحِي فَاصْنَعْ مَا شِئْتَ" (بُخاری شریف : ۶۱۲۰)
अनुवाद
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: "अगले नबियों की बातों में से लोगों ने जो महफ़ूज़ की हैं, यह है कि 'जब तेरे अंदर शर्म न रहे तो जो चाहे कर!'" (तोहफ़त-उल-क़ारी)
आदात, अख़लाक़ और तर्ज़-ए-अमल ख़ून और नस्ल दोनों की पहचान करा देते हैं
लेख

आदात, अख़लाक़ और तर्ज़-ए-अमल ख़ून और नस्ल दोनों की पहचान करा देते हैं

एक बादशाह के दरबार में एक अजनबी नौकरी की तलब लिए हाज़िर हुआ, क़ाबिलियत पूछी गई, कहा कि मैं सियासी हूँ। बादशाह के पास सियासतदानों की भीड़ रहती थी, उसे ख़ास घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज बना लिया गया, जो हाल ही में फ़ौत हो चुका था। चंद दिन बाद बादशाह ने उससे अपने सबसे महँगे और अज़ीज़ घोड़े के मुतअल्लिक़...

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