हदीस अल-रसूल ﷺ

وَعَنْ عِيَاضٍ بْنِ حِمَارٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ : سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُوْلُ " أَهْلُ الْجَنَّةِ ثَلاثَهُ " : ذُو سُلْطَانٍ مُقْسِطٌ مُوَفَّقٌ وَ رَجُلٌ رَحِيمٌ رَقِيقُ الْقَلْبِ لِكُلِّ ذِي قُرْبَى وَمُسْلِمٍ وَ عَفِيفٌ مُتَعَفِّفُ ذُوعِيَالٍ (رَوَاهُ مُسْلِمٌ)
अनुवाद
हज़रत इयाज़ बिन हिमार (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मरवी है, बयान करते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को फ़रमाते हुए सुना कि "तीन क़िस्म के लोग जन्नती हैं: इंसाफ़ करने वाला हुक्मरान जिसे भलाई की तौफ़ीक़ मिली हो, मेहरबान आदमी जिसका दिल हर रिश्तेदार और हर मुसलमान के लिए नर्म हो, वह पाक दामन जो अयालदार होने के बावुजूद सवाल से बचने वाला हो।" (तरीक़-उस-सालिहीन जिल्द:२ सफ़्हा:१३७, मुस्लिम)
बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता
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बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता

मुझे याद है कि देवबंद में जब मेरी उम्र तक़रीबन दस-बारह साल थी, एक दिन फज्र की नमाज़ के वक़्त सख़्त आंधी, मूसलाधार बारिश और गरज-चमक की बिना पर (वजह से) वालिद साहब (मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब) मस्जिद तशरीफ़ न ले जा सके और नमाज़ घर में ही अदा फ़रमाई। उधर दादा अब्बा, जो मस्जिद के आशिक़ और नमाज़ बा-जमात क...

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