وَعَنْ حَكِيمِ بْنِ مُعَاوِيَةَ الْقُشَيْرِيِّ عَنْ أَبِيهِ قَالَ: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا حَقُّ زَوْجَةِ أَحَدِنَا عَلَيْهِ؟ قَالَ: أَنْ تُطْعِمَهَا إِذَا طَعِمْتَ وَتَكْسُوَهَا إِذَا اكْتَسَيْتَ وَلَا تَضْرِبِ الْوَجْهَ وَلَا تُقَبِّحْ وَلَا تَهْجُرْ إِلَّا فِي الْبَيْتِ . رَوَاهُ أَحْمد وَأَبُو دَاوُد وَابْن مَاجَه(مشکوٰۃ المصابیح:۳۲۵۹)
अनुवाद
हज़रत हकीम बिन मुआविया क़ुशैरी (रहमतुल्लाह अलैह) अपने बाप से रिवायत करते हैं कि मैंने अर्ज़ किया कि, "ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! हम में से किसी की बीवी का उस पर क्या हक़ है?" आनहज़रत (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: "कि जब तुम खाओ, तो उसको भी खिलाओ, जब पहनो तो उसको भी पहनाओ, और चेहरे पर मत मारो, और उसको बुरा मत कहो, और घर के अलावा में अलाहदगी (अलगाव) मत इख्तियार करो।" (अहमद, अबू दाऊद, इब्न माजा) (अर-रफ़ीक़ अल-फ़सीह)