عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَا أَحَدَ أَصْبَرُ عَلَى أَذًى يَسْمَعُهُ مِنْ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ إِنَّهُ يُشْرَكُ بِهِ وَيُجْعَلُ لَهُ الْوَلَدُ ثُمَّ هُوَ يُعَافِيهِمْ وَيَرْزُقُهُمْ(مسلم شریف:۲۸۰۴)
अनुवाद
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: "कोई भी अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से बढ़कर तकलीफ़ों पर सब्र करने वाला नहीं है कि उसके साथ शरीक किया जाता है और उसके लिए औलाद साबित की जाती है, फिर भी वह उन्हें आफ़ियत और रिज़्क़ अता करता है।" (तफ़हीमुल मुस्लिम)