عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ أَنَّ النَّبِي جَاءَهُ رَجُلٌ فَقَالَ إنّی أُحَدِّثُ نَفْسِي بِالشَّيِّ لَأَنْ أَكُونَ حُمَمَةٌ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْ أَنْ أَتَكَلَّمَ بِهِ، قَالَ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِى رَدَّ أَمْرَهُ إِلَى الْوَسْوَسَةِ - (رواه ابو داؤد)
अनुवाद
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में एक शख़्स हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया: "कभी-कभी मेरे दिल में ऐसे बुरे ख़यालात आते हैं कि जल कर कोयला हो जाना मुझे इससे ज़्यादा महबूब है कि मैं उनको ज़बान से निकालूँ?" आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया: "अल्लाह की हम्द और उसका शुक्र है जिसने उसके मामले को वसवसे की तरफ़ लौटा दिया है।" (अबू दाऊद, मआरिफ़-उल-हदीस)