हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : مَنْ كَانَتْ عِنْدَهُ مَظْلِمَةٌ لِأَخِيهِ فَلْيَتَحَلَّلْهُ مِنْهَا ، فَإِنَّهُ لَيْسَ ثَمَّ دِينَارٌ وَلَا دِرْهَمٌ مِنْ قَبْلِ أَنْ يُؤْخَذَ لِأَخِيهِ مِنْ حَسَنَاتِهِ ، فَإِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ حَسَنَاتٌ أُخِذَ مِنْ سَيِّئَاتِ أَخِيهِ ، فَطُرِحَتْ عَلَيْهِ (بُخاری شریف: ۶۵۳۴)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि "जिसने अपने भाई पर ज़ुल्म किया हो तो उसे चाहिए कि उससे (इस दुनिया में) माफ़ कराए, इसलिए कि आख़िरत में दीनार व दिरहम नहीं होंगे। उससे उसके भाई के लिए उसकी नेकियाँ ली जाएँगी, पस अगर उसके पास नेकियाँ न हुईं तो उसके मज़लूम भाई की बुराइयाँ (मआसी) उस पर डाल दी जाएँगी।" (नस्र-उल-बारी)
साजिश हो तो ऐसी!
लेख

साजिश हो तो ऐसी!

एक व्यक्ति अपनी पत्नी को लेकर एक धार्मिक विद्वान (आलिम-ए-दीन) के पास आया और कहने लगा: "हज़रत साहब! यह मेरी पत्नी हैं, इन पर अचानक किसी साए (आसिब) का हमला हुआ है, शायद जिन्न चढ़ा है।" जब इमाम साहब ने दम-दुरूद (दुआ) किया तो जिन्न बातें करने लगा। हज़रत साहब: "अभी के अभी बाहर निकलो, वरना मैं... !"...

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