عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : مَنْ كَانَتْ عِنْدَهُ مَظْلِمَةٌ لِأَخِيهِ فَلْيَتَحَلَّلْهُ مِنْهَا ، فَإِنَّهُ لَيْسَ ثَمَّ دِينَارٌ وَلَا دِرْهَمٌ مِنْ قَبْلِ أَنْ يُؤْخَذَ لِأَخِيهِ مِنْ حَسَنَاتِهِ ، فَإِنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ حَسَنَاتٌ أُخِذَ مِنْ سَيِّئَاتِ أَخِيهِ ، فَطُرِحَتْ عَلَيْهِ (بُخاری شریف: ۶۵۳۴)
अनुवाद
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि "जिसने अपने भाई पर ज़ुल्म किया हो तो उसे चाहिए कि उससे (इस दुनिया में) माफ़ कराए, इसलिए कि आख़िरत में दीनार व दिरहम नहीं होंगे। उससे उसके भाई के लिए उसकी नेकियाँ ली जाएँगी, पस अगर उसके पास नेकियाँ न हुईं तो उसके मज़लूम भाई की बुराइयाँ (मआसी) उस पर डाल दी जाएँगी।" (नस्र-उल-बारी)