سَمِعْتُ الْبَرَاءَ، قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَوْمَ الْأَحْزَابِ يَنْقُلُ مَعَنَا التُّرَابَ، وَلَقَدْ وَارَى التُّرَابُ بَيَاضَ بَطْنِهِ، وَهُوَ يَقُولُ: وَاللهِ لَوْلَا أَنْتَ مَا اهْتَدَيْنَا، وَلَا تَصَدَّقْنَا وَلَا صَلَّيْنَا، فَأَنْزِلَنْ سَكِينَةً عَلَيْنَا، إِنَّ الْأُلَى قَدْ أَبَوْا عَلَيْنَا - قَالَ: وَرُبَّمَا قَالَ: إِنَّ الْمَلَا قَدْ أَبَوْا عَلَيْنَا - إِذَا أَرَادُوا فِتْنَةً أَبَيْنَا، وَيَرْفَعُ بِهَا صَوْتَهُ(مسلم شریف:کتاب الجہاد)
अनुवाद
हज़रत बरा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ग़ज़वा-ए-) अहज़ाब के दिन हमारे साथ मिट्टी उठा रहे थे और मिट्टी की वजह से आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पेट की सफ़ेदी उठी हुई थी और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमा रहे थे:
"अल्लाह की क़सम! (ऐ अल्लाह!) अगर तू हमें हिदायत न देता तो हम न सदक़ा देते और न ही हम नमाज़ पढ़ते। (ऐ अल्लाह!) हम पर सकीनत नाज़िल फ़रमा क्योंकि हम पर दुश्मन (इकट्ठे होकर) टूट पड़े हैं।" रावी कहते हैं कि कभी आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमाते:
"काफ़िरों ने हमारी बात मानने से इनकार कर दिया है और जब वे फ़ित्ना व फ़साद का इरादा करते हैं तो हम इनकार करते हैं।" और उस वक़्त आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की आवाज़ बुलंद होती। (तफ़हीम-उल-मुस्लिम)