سَمِعْتُ عَلِيًّا، يَقُولُ: مَا جَمَعَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَبَوَيْهِ لِأَحَدٍ، غَيْرِ سَعْدِ بْنِ مَالِكٍ، فَإِنَّهُ جَعَلَ يَقُولُ لَهُ يَوْمَ أُحُدٍ: ارْمِ فِدَاكَ أَبِي وَأُمِّي(مسلم شریف:۶۲۳۳)
अनुवाद
हज़रत अली (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने किसी के लिए अपने माता-पिता को जमा नहीं किया सिवाय सअद बिन मालिक के। (सअद बिन अबी वक़्क़ास के। मालिक उनके वालिद का नाम था जबकि अबू वक़्क़ास कुन्नियत थी।) आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उनसे ग़ज़वा-ए-उहुद के दिन फ़रमा रहे थे: तीरअंदाज़ी करो! तुम पर मेरे माँ-बाप क़ुर्बान हों! (तफ़हीम-उल-मुस्लिम)