मुहक्कक मसाला

इबादतों में रिया (दिखावा) हराम है

नुसूसे क़तइय्या (स्पष्ट प्रमाणों) से साबित है कि इबादतों में इख़्लास (निष्ठा) वाजिब है और रिया व दिखावा हराम है। अपनी इबादतों में अल्लाह की रज़ा (प्रसन्नता) का मक़सूद (उद्देश्य) होना इख़्लास है और किसी और चीज़ का मक़सूद होना रिया है। आप ﷺ ने रिया को शिर्के असग़र (छोटा शिर्क) फ़रमाया है। अगर कोई शख़्स इसलिए नमाज़ पढ़े कि लोग तर्क-ए-सलात (नमाज़ छोड़ते) हुए देखेंगे तो क्या कहेंगे, या कोई छात्र नमाज़ छोड़ने पर सज़ा के डर से नमाज़ पढ़े तो यह भी रिया में दाख़िल है। इस तरह से पढ़ी जाने वाली नमाज़ सही तो हो जाएगी मगर सवाब (पुण्य) से ख़ाली होगी, क्योंकि सेहत (वैधता) सवाब को और सवाब सेहत को मुस्तलज़िम (अनिवार्य) नहीं है; सेहत शराइत (शर्तों) और अरकान (स्तंभों) से मुतअल्लिक़ (संबंधित) है और सवाब इख़्लास से। लिहाज़ा जब कोई इबादत की जा रही हो तो इख़्लास के साथ की जाए ताकि वह सही भी हो जाए और आख़िरत में सवाब भी हासिल हो और यही इबादत की ग़रज़ (उद्देश्य) है। (अहम मसाइल/जि:२/पृ:२०७)

फ़ितना-ए-क़ादियानियत का पस-मंज़र (संक्षेप में)
लेख

फ़ितना-ए-क़ादियानियत का पस-मंज़र (संक्षेप में)

उपमहाद्वीप (पाक-ओ-हिंद) में जब अंग्रेज़ अपने ज़ुल्म-ओ-सितम और ज़्यादतियों के बावजूद मुसलमानों को मग़लूब (परास्त) न कर सका, तो उसने एक कमीशन के ज़रिए इसकी वजह मालूम करने के लिए पूरे हिंदुस्तान का सर्वे कराया। कमिशन ने यह रिपोर्ट पेश की कि मुसलमानों को मग़लूब करने के लिए उनके दिलों से जज़्बा-ए-जिहाद (...

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