ग़ैर-मुस्लिम फ़ुक़रा (ग़रीबों) को ज़कात देना।
कुछ लोग ग़ैर-मुस्लिम फ़ुक़रा को ज़कात दे देते हैं और यह समझते हैं कि उनकी ज़कात अदा हो गई, जबकि इस सूरत में ज़कात अदा नहीं हुई, क्योंकि ज़कात का मसरफ़ (हक़दार) सिर्फ़ मुसलमान फ़ुक़रा हैं, इसलिए उन पर दोबारा उतनी ही ज़कात मुसलमान ग़रीबों को देना लाज़िम है। (अहम मसाइल/जि:३/पृ:१३५)