ग़लती से ज़कात ज़्यादा दे देना।
अगर किसी शख़्स के ज़िम्मे ज़कात की अदायगी की मिक़दार थोड़ी बनती हो, और उसने ग़लती से ज़्यादा ज़कात दे दी, तो उसके लिए यह गुंजाइश है कि वह इस ज़ाइद (अतिरिक्त) मिक़दार को आइंदा साल की ज़कात में शुमार कर ले (गिन ले), और अगर इस ज़ाइद मिक़दार को नफ़्ली सदक़ा तसव्वुर करे (माने), और आइंदा साल की ज़कात अपने वक़्त पर अलग हिसाब लगाकर अदा करे, तो भी कोई हरज नहीं, बल्कि यह ज़्यादा फ़ज़ीलत का बाइस (कारण) है। (अहम मसाइल/जि:३/पृ:१३८)