मुहक्कक मसाला

ग़लती से ज़कात ज़्यादा दे देना।

अगर किसी शख़्स के ज़िम्मे ज़कात की अदायगी की मिक़दार थोड़ी बनती हो, और उसने ग़लती से ज़्यादा ज़कात दे दी, तो उसके लिए यह गुंजाइश है कि वह इस ज़ाइद (अतिरिक्त) मिक़दार को आइंदा साल की ज़कात में शुमार कर ले (गिन ले), और अगर इस ज़ाइद मिक़दार को नफ़्ली सदक़ा तसव्वुर करे (माने), और आइंदा साल की ज़कात अपने वक़्त पर अलग हिसाब लगाकर अदा करे, तो भी कोई हरज नहीं, बल्कि यह ज़्यादा फ़ज़ीलत का बाइस (कारण) है। (अहम मसाइल/जि:३/पृ:१३८)

हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी की बेमिसाल इस्तिक़ामत (दृढ़ता)
लेख

हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी की बेमिसाल इस्तिक़ामत (दृढ़ता)

एक बार हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) पर ग़द्दारी (राजद्रोह) का मुक़दमा चला और फ़िरंगी (अंग्रेज़) की अदालत हॉल कराची में उनकी पेशी हुई। मौलाना मोहम्मद अली जौहर और बहुत सारे दूसरे अकाबरीन (वरिष्ठ नेता) भी वहाँ जमा थे। फ़िरंगी ने बुलाया और कहा, "हुसैन अहमद! यह जो तुमने फ़तवा दिया है कि अंग्रेज़ की...

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