रोज़े में दाँत उखड़वाना।
कुछ लोग यह ख़याल करते हैं कि बहालत-ए-रोज़ा (रोज़े की हालत में) दाँत उखड़वाने से रोज़ा टूट जाता है, जबकि सही यह है कि रोज़े की हालत में दाँत उखड़वाने से रोज़ा नहीं टूटता है, क्योंकि रोज़े के टूटने और न टूटने का तअल्लुक़ (संबंध) ऐसी चीज़ों से है जो हलक़ के नीचे पहुँचती हों, दाँत चूँकि हलक़ से ऊपर है, इसलिए बज़ात-ए-ख़ुद (स्वयं) दाँत निकालने में कोई हरज नहीं है; अलबत्ता अगर दाँत उखड़वाते वक़्त जो ख़ून निकला उसको थूक के साथ निगल लिया और ख़ून थूक पर ग़ालिब (ज़्यादा) था तो रोज़ा टूट जाएगा, और अगर दोनों बराबर हों तब भी इस्तेहसानन (जूरिस्टिक प्रेफरेंस के तौर पर) रोज़ा टूट जाएगा। (अहम मसाइल/जि:४/पृ:९२)