रोज़ेदार का कान में तेल या दवा डालना।
रोज़े की हालत में कान में दवा या तेल डालने से रोज़ा फ़ासिद हो जाता है, क्योंकि फ़ुक़हा-ए-मुतक़द्दिमीन (प्राचीन फ़क़ीहों) के क़ौल (कथन) के मुताबिक़ कान में डाली हुई चीज़ के लिए दिमाग़ तक पहुँचने के लिए गुज़रगाह (रास्ता) मौजूद है, मगर जदीद साइंसी तहक़ीक़ (आधुनिक वैज्ञानिक शोध) से यह बात साबित है कि कान और दिमाग़ के बीच कोई गुज़रगाह नहीं है, अगर ऐसा ही है तो कान में दवा डालने से रोज़ा फ़ासिद नहीं होगा, इसलिए बेहतर यही है कि बहालत-ए-रोज़ा (रोज़े की हालत में) कान में दवा डालने से एहतियात बरती जाए। (अहम मसाइल/जि:४/पृ:९६)