रेल, कश्ती (नाव), समुद्री जहाज़ और हवाई जहाज़ जैसी सवारियों में फ़र्ज़ या नफ़्ल नमाज़ पढ़ते वक़्त क़िब्ले की तरफ़ रुख़ करना ज़रूरी है। कुछ ना-वाक़िफ़ (अनजान) लोग बिना किसी उज़्र (मज़बूरी) के रेल वग़ैरह के सफ़र में क़िब्ले का लिहाज़ किए बग़ैर जिधर चाहते हैं अपनी सहूलत (सुविधा) के हिसाब से नमाज़ पढ़ लेते हैं, यह जायज़ नहीं है। (किताब: किताब-उन-नवाज़िल / जिल्द: 3 / पृष्ठ: 440)