मुहक्कक मसाला

ग़ुस्ल के वक़्त कलमा पढ़ना ज़रूरी नहीं।

कुछ लोग यह कहते हैं कि ग़ुस्ल करते वक़्त कलमा पढ़ना ज़रूरी है, वरना नापाकी दूर नहीं होती। इसी तरह कुछ लोग मुर्दे को नहलाते वक़्त कलमा पढ़ने को ज़रूरी ख़याल करते हैं; शरअन (शरीयत के अनुसार) ये दोनों बातें साबित नहीं हैं, बल्कि ग़ुस्ल करते वक़्त कलमा या और कोई ज़िक्र करने को मना क़रार दिया गया है। (अहम मसाइल/जि:८/पृ:७७)

इमाम शाफ़ई (रह.) की मरज़-उल-वफ़ात (अंतिम बीमारी) की हालत
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इमाम शाफ़ई (रह.) की मरज़-उल-वफ़ात (अंतिम बीमारी) की हालत

इमाम मुज़नी (रह.) फ़रमाते हैं: मैं हज़रत इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाही अलैहि के पास उनकी मरज़-उल-वफ़ात (अंतिम बीमारी) में हाज़िर हुआ और उनसे अर्ज़ किया: "आपने किस हालत में सुबह की है?" फ़रमाया: "आज दुनिया से रुख़सत होने वाला हूँ, दोस्तों को छोड़ने वाला हूँ, मौत का प्याला पीने वाला हूँ, अपने बुरे आमाल (कर्म...

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