जो शख़्स ख़ुद रोज़ा न रखे उसकी दावत-ए-इफ़्तार का हुक्म।
जो शख़्स बिना किसी उज़्र-ए-शरई (धार्मिक मजबूरी/वैध कारण) के रमज़ान-उल-मुबारक का रोज़ा छोड़ता हो और ख़िलाफ़-ए-सुन्नत (सुन्नत के विरुद्ध) तरीक़े पर दावत-ए-इफ़्तार करता हो, तो ऐसे शख़्स की दावत-ए-इफ़्तार में शिरकत नहीं करनी चाहिए (शामिल नहीं होना चाहिए)। (किताब-उन-नवाज़िल/जि:६/पृ:३४८)