रोज़ा की हालत में लिवातत (समलैंगिकता) और मुश्त-ज़नी (हस्तमैथुन)।
लिवातत निहायत बदतरीन गुनाह और क़ाबिले लानत अमल है, बिल-ख़सूस रोज़ा के दौरान इस अमल का इर्तकाब शर्मनाक जुर्म है, इससे फ़ाइल और मफ़ऊल दोनों का रोज़ा टूट जाएगा, ख़्वाह इंजाल हो या न हो? अलबत्ता कफ़्फ़ारा लाज़िम नहीं है। इसी तरह मुश्त-ज़नी भी गुनाह है, जिसकी वजह से अगर इंजाल हो जाए तो रोज़ा टूट जाएगा और सिर्फ़ क़ज़ा लाज़िम होगी, कफ़्फ़ारा नहीं। (किताबुन नवाज़िल / जिल्द: 6 / सफ़हा: 379)