आख़िरी दीदार के लिए नमाज़े जनाज़ा के बाद मय्यत का मुँह देखना -
असल बात तो यह है कि चेहरा देखना कोई शरई हुक्म नहीं है कि इसके लिए बाक़ायदा एहतमाम किया जाए; ताहम अगर कोई चेहरा देखना चाहे तो नमाज़े जनाज़ा से क़ब्ल (पहले) दिखाने की इजाज़त है, नमाज़ के बाद न दिखाया जाए; क्योंकि इसमें दफ़न में ताख़ीर (देरी) लाज़िम आती है, और जहाँ यह रुनुमाई (चेहरा दिखाना) बाक़ायदा रस्म की सूरत इख़्तियार कर ले, वहाँ इस पर रोक-टोक करनी चाहिए। (किताबुन नवाज़िल / जिल्द: 6 / सफ़हा: 59)