मुहक्कक मसाला

मस्जिद की हुदूद (सीमाओं) में जमाअत के साथ नमाज़ हो जाने के बाद, बेहतर यही है कि तन्हा-तन्हा (अकेले-अकेले) नमाज़ पढ़ लें (दोबारा बा-जमाअत नमाज़ अदा न करें), यही ज़ाहिर-ए-रिवायत है। अगर अज़ान और इक़ामत के साथ जमाअत करके पढ़ें तो मकरूह-ए-तहरीमी है, और बिना अज़ान व इक़ामत जमाअत के साथ पढ़ना मकरूह-ए-तंज़ीही है। (अल-मब्सूत : 235/1) (किताब : दरसी व तालीमी अहम मसाइल / पृष्ठ: 97)

माह-ए-रमज़ान के सामाजिक लाभ
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माह-ए-रमज़ान के सामाजिक लाभ

माह-ए-रमज़ानुल मुबारक मुसलमानों के लिए महज़ एक इबादती महीना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा महीना है जो न सिर्फ़ व्यक्ति की रूहानी (आध्यात्मिक) तरबियत (प्रशिक्षण) करता है, बल्कि सामाजिक जीवन पर गहरे और सकारात्मक प्रभाव डालता है। यह महीना एक ऐसा अवसर प्रदान करता है जहाँ इंसान व्यक्तिगत सुधार के साथ-साथ सामा...

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