टीवी पर हरम शरीफ़ की तरावीह, मुनाज़रा (वाद-विवाद) या दीनी प्रोग्राम सुनना?
असल मसला यह है कि जिस चीज़ को टीवी के बिना देखना जायज़ है, उसकी तस्वीर या उसके अक्स (प्रतिबिंब) को टेलीविज़न या उसकी सीडी को कंप्यूटर पर भी देखने की गुंजाइश है, चाहे प्रोग्राम रिकॉर्डेड (टेप शुदा) हो या सीधा (लाइव) दिखाया जा रहा हो। लेकिन चूँकि इन चीज़ों में व्यस्त होकर आम तौर पर लोग अपनी हद में नहीं रहते; बल्कि नाजायज़ तस्वीरें देखने का ज़रिया और बहाना बना लेते हैं; इसलिए पूर्ण रूप से (मुतलकन) ऐसी चीज़ों को देखने से मना किया जाता है, और साहिब-ए-अहसनुल फ़तावा वग़ैरह ने इसी हिकमत (मस्लेहत) के कारण इन चीज़ों की मनाही का फ़तवा दिया है। (किताबुन नवाज़िल/खंड: 16/पृष्ठ: 444)