मय्यत के पैर इमाम के दाईं तरफ़ करके नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना?
अगर बेख़बरी (अनजाने) में मय्यत की नमाज़-ए-जनाज़ा इस तरह पढ़ी गई कि उसके पैर इमाम के दाईं तरफ़ और सिर बाईं तरफ़ था, तो नमाज़ बिना किसी कराहत के दुरुस्त हो गई; अलबत्ता जानबूझकर ऐसा करना सख़्त मकरूह है, लेकिन फिर भी नमाज़-ए-जनाज़ा दुरुस्त हो जाएगी, दोहराने की ज़रूरत न होगी। (किताबुन नवाज़िल / जिल्द: 6 / सफ़हा: 142)