रबी-उल-अव्वल में फ़र्ज़ होने वाली ज़कात रमज़ान तक रोकना?
जिस वक्त साल पूरा हो उसी वक्त मुस्तहिकीन (हक़दारों) को तलाश करके ज़कात देना बेहतर है, रमज़ान शरीफ़ तक मुअख्खर (देरी) करने की ज़रूरत नहीं; अगर ज़्यादा सवाब की ख़्वाहिश है तो रमज़ान शरीफ़ तक हिसाब लगाएं, यह मुश्किल हो तो हर साल पेशगी (एडवांस) ज़कात रमज़ान के महीने में अदा किया करें। (किताबुन नवाज़िल / जिल्द: 6 / सफ़हा: 549)