अगर किसी शख्स को नमाज़ के दौरान किसी रुक्न के अदा करने या अदा न करने में शक हो, और वह एक रुक्न अदा करने यानी तीन मर्तबा 'सुभान अल्लाह' पढ़ने के बराबर सोचता ही रहे, न क़िरात में मशग़ूल हो और न ज़िक्र व तस्बीह में, तो इस सूरत में उस पर सजदा सह्व वाजिब होगा, और अगर सोचने के दौरान नमाज़ भी पढ़ता रहा तो सजदा सह्व वाजिब नहीं होगा। (किताब: अहम मसाइल / पृष्ठ: 72)