तहज्जुद का वक़्त?
तहज्जुद का वक़्त वही है जो इशा का वक़्त है, इशा की नमाज़ के बाद से फ़ज्र का वक़्त शुरू होने तक कभी भी नमाज़-ए-तहज्जुद पढ़ी जा सकती है। हैसमी की रिवायत है: "इशा के बाद जो भी नमाज़ पढ़ी जाए, वह क़ियाम-उल-लैल यानी तहज्जुद है।" फ़ुक़हा ने मामूलात-ए-नबवी को सामने रखते हुए लिखा है कि अगर कोई एक तिहाई रात तहज्जुद में गुज़ारना चाहता हो तो रात का दरमियानी तिहाई हिस्सा अफ़ज़ल है, और अगर आधी रात तहज्जुद पढ़ना चाहता हो तो आख़िरी आधे हिस्से को तहज्जुद में गुज़ारना अफ़ज़ल है। (किताबुल फ़तावा / जि: 2 / पृ: 118)