कफ़्फ़ारा कब वाजिब होता है?
रोज़ा याद होने की हालत में अगर कोई मुकल्लफ़ (शरीअत का पाबंद) शख़्स रमज़ान में जान-बूझकर बिना किसी इश्तिबाह (संदेह या ग़लतफ़हमी) के कोई मनपसंद ग़िज़ा (भोजन) या नफ़ा-बख़्श (लाभदायक) दवा खा-पीकर या जिमा (सहवास) करके रोज़े को फ़ासिद कर दे (तोड़ दे), तो उस पर क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों लाज़िम होते हैं। (किताब: किताबुन नवाज़िल / जि: 6 / पृ: 401)