मुहक्कक मसाला

कफ़्फ़ारा कब वाजिब होता है?

रोज़ा याद होने की हालत में अगर कोई मुकल्लफ़ (शरीअत का पाबंद) शख़्स रमज़ान में जान-बूझकर बिना किसी इश्तिबाह (संदेह या ग़लतफ़हमी) के कोई मनपसंद ग़िज़ा (भोजन) या नफ़ा-बख़्श (लाभदायक) दवा खा-पीकर या जिमा (सहवास) करके रोज़े को फ़ासिद कर दे (तोड़ दे), तो उस पर क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों लाज़िम होते हैं। (किताब: किताबुन नवाज़िल / जि: 6 / पृ: 401)

इल्म का मंशूर: शरियत के विद्यार्थियों (तलबा) के लिए महत्वपूर्ण और इब्रतनाक नसीहतें (भाग दो)
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इल्म का मंशूर: शरियत के विद्यार्थियों (तलबा) के लिए महत्वपूर्ण और इब्रतनाक नसीहतें (भाग दो)

बिस्मिल्लाह; रब्बी यस्सिर व अ'इन! (अल्लाह के नाम से; ऐ मेरे रब, आसानी फ़रमा और मदद कर!) नोट: इस मंशूर (घोषणापत्र) के मुखातिब (संबोधित लोग) सिर्फ उलूमे शरीयत (इस्लामी शास्त्र के ज्ञान) के तलबा (विद्यार्थी) हैं। इल्मे शरई (धार्मिक ज्ञान) को अल्लाह तआला ने 'कौले थक़ील' (एक भारी बात) क़रार दिया है। य...

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