दूसरे की तरफ़ से रोज़ा रखना?
कोई शख़्स दूसरे के क़ज़ा रोज़े अपनी तरफ़ से नहीं रख सकता; बल्कि जिस पर रोज़ा फ़र्ज़ है उसी पर अदायगी लाज़िम है; अलबत्ता अगर वह किसी बीमारी या बुढ़ापे की वजह से रोज़ा रखने से ऐसा माज़ूर (असमर्थ) हो जाए कि अब मरते दम तक रोज़ा रखने की ताक़त की कोई उम्मीद न हो, तो ऐसा शख़्स रोज़े के बदले में फ़िदया दे सकता है, जिसकी मिक़दार एक सदक़ा-ए-फ़ित्र के बराबर है। लेकिन उसकी जगह पर दूसरे शख़्स के रोज़ा रखने से उसका फ़र्ज़ रोज़ा अदा न होगा। (किताब: किताबुन नवाज़िल / जि: 6 / पृ: 398)