मुहक्कक मसाला

अफ़ज़ल (बेहतर) यह है कि जो शख़्स अज़ान कहे वही इक़ामत कहे। किसी और शख़्स के इक़ामत कहने पर अगर मुअज़्ज़िन को नागवारी (बुरा) महसूस होती हो, तो दूसरे शख़्स का इक़ामत कहना मकरूह है, क्योंकि इक़ामत कहना मुअज़्ज़िन का हक़ है। अलबत्ता अगर मुअज़्ज़िन की ग़ैर-मौजूदगी में या उसकी इजाज़त से दूसरा शख़्स इक़ामत कहे, तो बिना किसी कराहत के जायज़ है। (अहम मसाइल / जि.: 5 / पृष्ठ: 75)

शेख अबू हाज़िम की हक़-गोई और सुलेमान बिन अब्दुल मलिक का रो पड़ना
लेख

शेख अबू हाज़िम की हक़-गोई और सुलेमान बिन अब्दुल मलिक का रो पड़ना

सुलेमान बिन अब्दुल मलिक, जो बनू उमय्या का बादशाह था, ने एक मर्तबा शैख़-उल-हदीस अबू हाज़िम (रहमतुल्लाह अलैह) से दरयाफ़्त (पूछा) किया कि इसकी क्या वजह है कि हम लोग दुनिया को पसंद और आख़िरत को नापसंद करते हैं? आपने बरजस्ता (तुरंत) जवाब दिया, "क्योंकि तुम लोगों ने अपनी दुनिया को आबाद किया और अपनी आख़िरत को...

ट्रेंडिंग न्यूज़

सभी समाचार