अफ़ज़ल (बेहतर) यह है कि जो शख़्स अज़ान कहे वही इक़ामत कहे। किसी और शख़्स के इक़ामत कहने पर अगर मुअज़्ज़िन को नागवारी (बुरा) महसूस होती हो, तो दूसरे शख़्स का इक़ामत कहना मकरूह है, क्योंकि इक़ामत कहना मुअज़्ज़िन का हक़ है। अलबत्ता अगर मुअज़्ज़िन की ग़ैर-मौजूदगी में या उसकी इजाज़त से दूसरा शख़्स इक़ामत कहे, तो बिना किसी कराहत के जायज़ है। (अहम मसाइल / जि.: 5 / पृष्ठ: 75)